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सुबह के आकाश में बुध ग्रह: सूर्योदय से पहले शुक्र की मदद से उसे ढूँढ़ें
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20 नवंबर की देर रात (UTC; भारतीय समय के अनुसार 21 नवंबर की सुबह लगभग 5 बजे) बुध ग्रह सूर्य के पश्चिम में उससे अपनी सबसे बड़ी कोणीय दूरी, 19.6°, पर पहुँचेगा — इसे बुध का अधिकतम पश्चिमी प्रसरकोण कहते हैं। उत्तरी गोलार्ध के प्रेक्षकों के लिए इस तारीख़ के आसपास की सुबहें इस ग्रह को देखने का अच्छा मौक़ा हैं: नंगी आँखों से दिखने वाले ग्रहों में बुध ही सबसे मुश्किल से नज़र आता है। उसके ऊपर, दाईं ओर, चमकीला शुक्र उसे खोजने में रास्ता दिखाता है।
उत्तरी गोलार्ध के प्रेक्षकों के लिए नवंबर का आख़िरी हिस्सा अच्छा समय क्यों है
बुध ग्रह की कक्षा पृथ्वी की कक्षा के अंदर है, इसलिए यहाँ से देखने पर यह ग्रह सूर्य के एक ओर से दूसरी ओर झूलता-सा लगता है। जब वह सूर्य के पश्चिम में होता है, तो सूर्योदय से पहले उगता है और भोर के झुटपुटे में दिखता है; 20 नवंबर की देर रात (UTC) वह इस ओर सूर्य से अपनी सबसे बड़ी कोणीय दूरी पर पहुँचता है।
यह दूरी बहुत बड़ी नहीं है, पर क्रांतिवृत्त की स्थिति इसमें मदद करती है — आकाश में सूर्य का सालाना रास्ता, जिसके आसपास ही ग्रह रहते हैं। उत्तरी गोलार्ध की शरद ऋतु में सूर्योदय से पहले यह रास्ता पूर्वी क्षितिज से खड़ा उठता है: नई दिल्ली से देखने पर 20 नवंबर की भोर में, जब सूर्य क्षितिज से 6° नीचे होता है, क्रांतिवृत्त क्षितिज से लगभग 75° का कोण बनाता है, जबकि मार्च विषुव के आसपास भोर में सिर्फ़ 38° का। रास्ता खड़ा हो, तो बुध सूर्य के एक तरफ़ नहीं, बल्कि उसके ऊपर आता है, और सूर्य से उसकी कोणीय दूरी का ज़्यादा हिस्सा क्षितिज से उसकी ऊँचाई के रूप में दिखता है।
साल के इस समय सूर्य के पश्चिम में क्रांतिवृत्त उत्तर की ओर बढ़ता है, और बुध ख़ुद भी क्रांतिवृत्त से लगभग 2° उत्तर में है। इन दोनों कारणों से आकाश में यह ग्रह सूर्य से काफ़ी उत्तर में दिखता है। दिक्पात आकाश में वही है, जो धरती पर अक्षांश: बुध का दिक्पात −12.2° है, सूर्य का −19.8°। इसी वजह से उत्तरी अक्षांशों पर बुध सूर्य से काफ़ी पहले उगता है; नई दिल्ली में सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटा पहले।
कहाँ देखें
सूर्योदय से लगभग एक घंटा पहले पूर्व-दक्षिण-पूर्व में, क्षितिज के पास देखें (उत्तरी यूरोप जैसे ज़्यादा उत्तरी इलाक़ों से दक्षिण-पूर्व में)। तब तक नई दिल्ली में बुध ग्रह लगभग 6° ऊपर आ चुका होता है (40° से 59° उत्तरी अक्षांश तक 7–8°); उससे पहले वह और नीचे होता है, जहाँ क्षितिज के पास की धुंध उसे और ढक लेती है। पहले शुक्र को ढूँढ़ें। अक्टूबर के अंत में वह पृथ्वी और सूर्य के बीच से गुज़रा था, और अब आकाश के उस हिस्से का सबसे चमकीला पिंड है, कांतिमान −4.9 (इस पैमाने पर संख्या जितनी कम हो, पिंड उतना ही ज़्यादा चमकीला होता है)। बुध उससे नीचे बाईं ओर है: 20 नवंबर को शुक्र से लगभग 15° दूर, यानी फैली हुई बाँह पर लगभग डेढ़ मुट्ठी की चौड़ाई। यह दूरी 14 तारीख़ को 13° से बढ़कर 26 तारीख़ को 20° हो जाती है, क्योंकि शुक्र बुध से ज़्यादा तेज़ी से सूर्य से दूर होता जाता है, और बुध 20 तारीख़ के बाद सूर्य की ओर लौटने लगता है।
20 नवंबर को भोर में, जब सूर्य क्षितिज से 6° नीचे होता है और नागरिक संधि काल शुरू होता है, दोनों ग्रह इतनी ऊँचाई पर होंगे:
- 28.6° उत्तरी अक्षांश (नई दिल्ली): बुध 13°, शुक्र 26°; नागरिक संधि काल सूर्योदय से 28 मिनट पहले शुरू होता है।
- 59° उत्तरी अक्षांश (स्टॉकहोम, ओस्लो): बुध 8°, शुक्र 16°; नागरिक संधि काल सूर्योदय से 54 मिनट पहले शुरू होता है।
- 51.5° उत्तरी अक्षांश (लंदन): बुध 10°, शुक्र 19°; नागरिक संधि काल सूर्योदय से 42 मिनट पहले शुरू होता है।
नई दिल्ली में बुध लगभग 17 से 23 नवंबर तक इसी ऊँचाई के आसपास, 12–13° पर, रहता है। शुक्र से लगभग 2° दाईं ओर और ज़रा नीचे कन्या तारामंडल का सबसे चमकीला तारा चित्रा है। उसे बुध न समझ बैठें: बुध उससे ज़्यादा चमकीला है और काफ़ी नीचे, बाईं ओर दिखता है।
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आपको क्या दिखेगा
नंगी आँखों से बुध उजले होते आकाश में बस रोशनी का एक बिंदु है, और वह दिन-ब-दिन ज़्यादा चमकीला होता जाता है, क्योंकि हमें उसके रोशन गोलार्ध का ज़्यादा हिस्सा दिखने लगता है: 14 नवंबर को कांतिमान +0.3, 17 को −0.2, 20 को −0.4 और 23 को −0.6। पर क्षितिज के पास धुंध उसकी चमक कम कर देती है, इसलिए वह इन संख्याओं के हिसाब से जितना चमकीला होना चाहिए, उससे फीका दिख सकता है।
द्विनेत्री दूरबीन से मदद मिलती है: शुक्र से शुरू करके दूरबीन को धीरे-धीरे नीचे और बाईं ओर ले जाएँ, और जब बुध मिल जाए, तो दूरबीन नीचे करके उसे नंगी आँखों से ढूँढ़ें। सूर्योदय से पहले द्विनेत्री दूरबीन हटा लें। सूर्य उसी जगह के पास उगता है, जहाँ आप देख रहे थे, और द्विनेत्री दूरबीन से उस पर पल भर की नज़र भी आँखों को हमेशा के लिए नुक़सान पहुँचा सकती है।
चंद्रमा आड़े नहीं आएगा: 23 नवंबर तक वह भोर होने से पहले ही डूब चुका होता है, और 24 तारीख़ की पूर्णिमा से वह भोर में पश्चिम में नीचे रहता है — आकाश में बुध से उलटी दिशा में।
बुध ग्रह को देखना मुश्किल क्यों है
बुध ग्रह की कक्षा इतनी छोटी है कि पृथ्वी से देखने पर यह ग्रह सूर्य से कभी लगभग 28° से ज़्यादा दूर नहीं जाता। इसलिए मध्य उत्तरी अक्षांशों से वह क्षितिज के पास और संधि काल के उजाले में ही दिखता है; पूरी तरह अंधेरे आकाश में शायद ही कभी। इस बार उसकी अधिकतम दूरी सिर्फ़ 19.6° है, क्योंकि अभी सूर्य से बुध की दूरी लगभग 5 करोड़ किलोमीटर है — उसकी सबसे कम दूरी (4.6 करोड़ किलोमीटर) के क़रीब और सबसे ज़्यादा दूरी (7 करोड़ किलोमीटर) से काफ़ी कम। बुध सूर्य के जितना पास होता है, पृथ्वी से देखने पर सूर्य से उसकी अधिकतम आभासी दूरी उतनी ही कम होती है।
स्रोत और लाइसेंस
- JPL Horizons (नासा/JPL) — बुध ग्रह, शुक्र ग्रह, सूर्य और चंद्रमा की स्थितियाँ, प्रसरकोण, कांतिमान, कला, दिक्पात, और प्रेक्षण-स्थल से उनका उन्नतांश और दिगंश; 17 अक्टूबर 2026 को परिकलित (नई दिल्ली के लिए 20 अक्टूबर 2026 को)। https://ssd.jpl.nasa.gov/horizons/
- SIMBAD (CDS, स्ट्रासबर्ग) — चित्रा तारे (alf Vir) और स्वाति तारे (alf Boo) के निर्देशांक और V कांतिमान। https://simbad.cds.unistra.fr/simbad/
- नासा NSSDC, बुध ग्रह की तथ्य-तालिका (Mercury Fact Sheet) — बुध ग्रह की उपसौर दूरी (4.60 करोड़ किलोमीटर) और अपसौर दूरी (6.98 करोड़ किलोमीटर)। https://nssdc.gsfc.nasa.gov/planetary/factsheet/mercuryfact.html



