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धूमकेतु यूक्लिड: गैलेक्सियों का नक़्शा बनाने वाली ईएसए की दूरबीन ने अपना पहला धूमकेतु खोजा

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धुँधली गैलेक्सियों और कुछ चमकीले तारों से भरा एक श्वेत-श्याम दृश्य। उसका एक छोटा चौकोर हिस्सा दाईं ओर एक अलग खाने में बड़ा करके दिखाया गया है। उस खाने में एक तीर धूमकेतु की ओर इशारा करता है: हल्की गोल धुँध के भीतर एक छोटी, चमकीली लकीर।
यूक्लिड के VIS कैमरे से 20 सितंबर 2026 को ली गई तस्वीर में धूमकेतु C/2026 S1 (Euclid)। बाईं ओर पूरा दृश्य है, जो दूर की गैलेक्सियों से भरा है; दाईं ओर चौकोर घेरे वाला हिस्सा बड़ा करके दिखाया गया है। धूमकेतु एक छोटी लकीर जैसा दिखता है, क्योंकि 560 सेकंड के एक्सपोज़र के दौरान वह आकाश में अपनी जगह बदलता रहा। उसके चारों ओर की हल्की धुँध उसका कोमा है — धूल और गैस का बादल। पैमाने की पट्टियाँ 30 और 5 चाप सेकंड का कोणीय माप दिखाती हैं (एक चाप सेकंड एक डिग्री का 3,600वाँ हिस्सा होता है)।ESA/Euclid/Euclid Consortium/NASA, M. Pöntinen et al. 2026 (आकार बदला गया) · CC BY-SA 3.0 IGO

गैलेक्सियों का नक़्शा तैयार करने के लिए बनाई गई यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ईएसए) की यूक्लिड अंतरिक्ष दूरबीन ने अपना पहला धूमकेतु खोजा है, जिसे अब C/2026 S1 (Euclid) नाम मिला है। यह पृथ्वी से लगभग 1.3 अरब किलोमीटर दूर है और उस तल से बहुत ऊपर है, जिसमें ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हैं — लगभग सूर्य के ठीक ऊपर। इसकी कक्षा उस तल से 85° झुकी हुई है।

गैलेक्सियों के सर्वेक्षण में मिला धूमकेतु

यूक्लिड अरबों गैलेक्सियों की आकृतियाँ और स्थितियाँ मापता है, ताकि उनसे डार्क मैटर और डार्क एनर्जी का पता चल सके। चलते हुए पिंडों पर नज़र रखने के लिए उसे बनाया ही नहीं गया: आम तौर पर वह आकाश के हर हिस्से की तस्वीर एक ही बार लेता है, और ग्रहों के तल के साथ-साथ फैली उस पट्टी से बचता है, जिसमें क्षुद्रग्रहों और धूमकेतुओं की भीड़ है और जिसकी पृष्ठभूमि सौर मंडल की धूल से चमकती रहती है।

धूमकेतु “यूक्लिड डीप फ़ील्ड नॉर्थ” में मिला: शिशुमार तारामंडल में आकाश का 20 वर्ग डिग्री का एक हिस्सा, जिसे यूक्लिड बार-बार देखता है। यह क्षेत्र क्रांतिवृत्त के उत्तरी ध्रुव के पास है — आकाश का वह बिंदु, जो ग्रहों के तल के ठीक ऊपर पड़ता है। धूमकेतु उस तल से इतना ऊपर है कि पृथ्वी से देखने पर वह इसी ध्रुव से कुछ ही डिग्री दूर, यानी इसी क्षेत्र के भीतर दिखाई देता है। ईएसए के शब्दों में यह खोज धूमकेतु के रास्ते और यूक्लिड की समय-सारणी का एक सुखद संयोग है।

हेलसिंकी विश्वविद्यालय में पीएचडी कर रहे मिक्को पोंटिनेन ने यूक्लिड की तस्वीरों में चलते पिंड खोजने के लिए एक सॉफ़्टवेयर बनाया था। इस सॉफ़्टवेयर ने कई फ़्रेमों में दिख रही एक लकीर को पकड़ा। पोंटिनेन ने हिसाब लगाया कि पिंड आगे कहाँ होना चाहिए, और उसे 16 से 24 सितंबर 2026 के बीच लिए गए 16 एक्सपोज़रों में ढूँढ़ निकाला। उसके चारों ओर एक धुँधला बादल था, और इसी से पता चला कि यह धूमकेतु है। ऐसी खोजों को दर्ज करने और जाँचने का काम अंतरराष्ट्रीय खगोलीय संघ का माइनर प्लैनेट सेंटर करता है; ज़मीन पर स्थित दूरबीनों से इसकी पुष्टि करने वाले प्रेक्षण हो जाने के बाद सेंटर ने 8 अक्टूबर को इसकी घोषणा की।

लगभग सीधी खड़ी कक्षा

ग्रह लगभग एक ही तल में सूर्य की परिक्रमा करते हैं; इस धूमकेतु की कक्षा उस तल से 85° झुकी है। 28 अक्टूबर 2026 को धूमकेतु सूर्य से 8.9 खगोलीय इकाई दूर होगा (एक खगोलीय इकाई पृथ्वी से सूर्य की दूरी है), और ग्रहों के तल से उसकी ऊँचाई भी लगभग इतनी ही होगी। उस दिन उसके प्रकाश को हम तक पहुँचने में 74 मिनट लगेंगे।

सूर्य के चारों ओर बृहस्पति, शनि, अरुण और वरुण की कक्षाओं का परिप्रेक्ष्य चित्र, जिसमें ये कक्षाएँ चपटे दीर्घवृत्तों जैसी दिखती हैं। धूमकेतु का रास्ता बाईं ओर इस तल से लगभग सीधा ऊपर उठता है, सूर्य के ऊपर ऊँचा चाप बनाता है और दाईं ओर फिर नीचे उतरता है। ऊपर की ओर उसकी मौजूदा स्थिति और सूर्य के सबसे क़रीब पहुँचने का बिंदु चिह्नित हैं।
विशाल ग्रहों की कक्षाओं के बीच धूमकेतु का रास्ता, जिसकी गणना उसकी मौजूदा कक्षा से की गई है। छायांकित सतह धूमकेतु की कक्षा के तल का वह हिस्सा है, जो ग्रहों के तल से ऊपर है; रास्ते के जो हिस्से टूटी रेखा से दिखाए गए हैं, वे उस तल के नीचे हैं। बिंदु दिखाते हैं कि 28 अक्टूबर 2026 को ग्रह कहाँ हैं।चित्र: SkyFlux · JPL SBDB, JPL Horizons

सूर्य के सबसे क़रीब यह सितंबर 2027 में पहुँचेगा, 8.7 खगोलीय इकाई की दूरी पर। शनि ग्रह भी अपनी कक्षा में सूर्य के इतने क़रीब कभी नहीं आता। उस समय धूमकेतु ग्रहों के तल से लगभग 8.5 खगोलीय इकाई ऊपर होगा, इसलिए वह किसी भी ग्रह के आसपास तक नहीं पहुँचेगा। नासा की जेट प्रणोदन प्रयोगशाला (JPL) के अनुसार सूर्य के सबसे क़रीब पहुँचने की सूर्य के सबसे क़रीब पहुँचने की यह तारीख़ 20 सितंबर है, माइनर प्लैनेट सेंटर के अनुसार 2 सितंबर; दोनों की कक्षा-गणनाएँ एक महीने से कम के प्रेक्षणों पर टिकी हैं।

ईएसए की घोषणा में बस इतना कहा गया है कि एक चक्कर में हज़ारों साल लगते हैं, जबकि मौजूदा गणनाओं में यह अवधि इससे कहीं लंबी निकलती है: JPL और माइनर प्लैनेट सेंटर की मौजूदा कक्षा-गणनाओं के हिसाब से एक चक्कर में क्रमशः लगभग 1.9 लाख और 89 हज़ार साल लगते हैं। प्रेक्षण अभी इतने कम हैं कि दोनों में से कोई भी गणना यह संभावना ख़ारिज नहीं कर सकती कि यह धूमकेतु पहली और आख़िरी बार सूर्य के पास से गुज़र रहा है।

सूर्य से इतनी दूर होने पर भी इसके चारों ओर कोमा क्यों है?

धूमकेतु सौर मंडल के जन्म के समय से बचे हुए बर्फ़ीले, धूल भरे पिंड हैं। सूर्य के पास उनकी बर्फ़ गैस बनने लगती है, और गैस और धूल मिलकर कोमा और पूँछ बनाती हैं। पानी की बर्फ़, जो धूमकेतुओं में सबसे आम है, सूर्य से लगभग 3 खगोलीय इकाई से आगे मुश्किल से ही गैस बनती है; इसलिए लगभग 9 खगोलीय इकाई पर दिख रही इस सक्रियता के पीछे शायद कार्बन मोनोक्साइड जैसे ज़्यादा वाष्पशील पदार्थों की बर्फ़ है। इस धूमकेतु से निकलने वाली गैस का अब तक कोई माप प्रकाशित नहीं हुआ है, इसलिए यह व्याख्या अभी पुष्ट नहीं है।

यूक्लिड और ज़मीन के दो प्रेक्षकों के माप में कोमा लगभग 10 चाप सेकंड चौड़ा निकला। धूमकेतु की दूरी पर यह लगभग 65,000 किलोमीटर बैठता है, यानी पृथ्वी के व्यास का पाँच गुना।

क्या आप इसे ख़ुद देख सकते हैं?

नहीं। नंगी आँख से तो नहीं ही, शौक़िया प्रेक्षकों की बड़ी दूरबीन में आँख लगाकर भी नहीं। अक्टूबर के आख़िर में इसका अनुमानित कांतिमान लगभग 20.5 (JPL) या 20.7 (माइनर प्लैनेट सेंटर) है। एक आशावादी मोटे नियम के अनुसार, किसी अंधेरी जगह से 50 सेंटीमीटर व्यास वाली दूरबीन से एक अनुभवी प्रेक्षक लगभग कांतिमान 17 तक के पिंड देख पाता है; यह धूमकेतु उससे लगभग 25 गुना मद्धिम है, और उसका प्रकाश भी एक बिंदु में नहीं, धुँध में फैला हुआ है। लंबे एक्सपोज़र वाली तस्वीरें इसे दर्ज कर सकती हैं, और बाद में इसका प्रेक्षण करने वालों में 30 से 43 सेंटीमीटर व्यास की दूरबीनों वाली शौक़िया वेधशालाएँ भी थीं।

यह शिशुमार तारामंडल में है, +62° दिक्पात पर। भारत में लगभग 28° उत्तरी अक्षांश से ऊपर, यानी मोटे तौर पर नई दिल्ली और उससे उत्तर के इलाक़ों में, यह कभी अस्त नहीं होता। आकाश पूरी तरह अंधेरा हो जाने पर यह नई दिल्ली में क्षितिज से लगभग 46° ऊपर होता है, मुंबई में लगभग 37° और चेन्नई में लगभग 31° ऊपर। इसके बाद यह रात भर उत्तरी आकाश में क्षितिज की ओर उतरता जाता है। नई दिल्ली में भोर से पहले यह उत्तरी क्षितिज को लगभग छूता हुआ गुज़रता है, जबकि मुंबई, चेन्नई और भारत के ज़्यादातर हिस्सों में यह रात में ही अस्त हो जाता है और भोर से पहले वापस नहीं उगता।

स्रोत और लाइसेंस

  • ईएसए, Euclid discovers new comet (19 अक्टूबर 2026) — इससे लिए गए: खोज, तस्वीरों की तारीख़ें (16–24 सितंबर 2026), 16 एक्सपोज़र, खोजकर्ता और उनका सॉफ़्टवेयर, यूक्लिड डीप फ़ील्ड नॉर्थ, 8 अक्टूबर को माइनर प्लैनेट सेंटर की पुष्टि, 1.3 अरब किलोमीटर की दूरी, सूर्य से देखने पर “सीधे ऊपर” की स्थिति, हज़ारों साल की कक्षीय अवधि, और यूक्लिड के सर्वेक्षण का तरीक़ा। https://www.esa.int/Science_Exploration/Space_Science/Euclid/Euclid_discovers_new_comet
  • धूमकेतु पर ईएसए के चित्र-पृष्ठ — इनसे लिए गए: मुख्य तस्वीर और उसका विवरण (20 सितंबर 2026, 560.52 सेकंड का एक्सपोज़र), कार्ड की तस्वीर (धूमकेतु पर संरेखित 89.5 सेकंड के आठ एक्सपोज़र), श्रेय और लाइसेंस। https://www.esa.int/ESA_Multimedia/Images/2026/10/Comet_C_2026_S1_Euclid_observations_in_context और https://www.esa.int/ESA_Multimedia/Images/2026/10/A_composite_of_eight_Euclid_VIS_exposures_of_Comet_C_2026_S1_Euclid
  • ईएसए, Euclid's wide and deep surveys — इससे लिया गया: यूक्लिड डीप फ़ील्ड नॉर्थ — शिशुमार तारामंडल में 20 वर्ग डिग्री, क्रांतिवृत्त के उत्तरी ध्रुव के बहुत पास, जिसे इसलिए चुना गया कि वह साल भर देखा जा सके। https://www.esa.int/ESA_Multimedia/Images/2023/02/Euclid_s_wide_and_deep_surveys
  • माइनर प्लैनेट सेंटर (MPC), MPEC 2026-T146: Comet C/2026 S1 (Euclid) (8 अक्टूबर 2026) — इससे लिए गए: कोमा की रिपोर्टें, बाद में प्रेक्षण करने वाली वेधशालाओं और उनकी दूरबीनों की सूची, MPC की कक्षा-गणना (q = 8.754 खगोलीय इकाई, e = 0.9956, यानी a ≈ 1,993 खगोलीय इकाई और लगभग 89 हज़ार साल की अवधि), MPC के अनुसार उपसौर की तारीख़ (2 सितंबर 2027) और MPC द्वारा चमक का पूर्वानुमान। https://minorplanetcenter.net/mpec/K26/K26TE6.html
  • JPL Small-Body Database, C/2026 S1 (Euclid), कक्षा समाधान JPL#2 — इससे लिए गए: झुकाव (85.2°), उपसौर दूरी (8.74 खगोलीय इकाई), उत्केंद्रता, उपसौर की तारीख़ (20 सितंबर 2027, अनिश्चितता 28 दिन), कक्षा का आकार (a = 3,310 खगोलीय इकाई, जिससे लगभग 1.9 लाख साल की अवधि निकलती है) और उसकी अनिश्चितता, 0.997 ± 0.007 की उत्केंद्रता, जो खुली कक्षा की संभावना भी ख़ारिज नहीं करती, और प्रेक्षणों की अवधि (16 सितंबर – 13 अक्टूबर 2026)। https://ssd.jpl.nasa.gov/tools/sbdb_lookup.html#/?sstr=C/2026%20S1
  • JPL Horizons — इससे लिए गए: सूर्य और पृथ्वी से धूमकेतु की दूरियाँ, ग्रहों के तल से उसकी ऊँचाई, आकाश में उसकी स्थिति और अनुमानित चमक, वे तारीख़ें और दूरियाँ जिन पर वह ग्रहों के तल को पार करता है, चित्र में ग्रहों की स्थितियाँ और कक्षाएँ, और नई दिल्ली, मुंबई और चेन्नई से दृश्यता (कभी अस्त न होने की 28° उत्तरी अक्षांश वाली सीमा हमारी अपनी गणना है: 90° − 61.8°)। https://ssd.jpl.nasa.gov/horizons/
  • M. Womack, G. Sarid, K. Wierzchos, CO in distantly active comets (2017) — इससे लिए गए: पानी की बर्फ़ के गैस बनने की लगभग 3 खगोलीय इकाई वाली सीमा, और यह बात कि इससे दूर भी धूमकेतुओं के सक्रिय होने के पीछे कार्बन मोनोक्साइड हो सकती है। https://arxiv.org/abs/1611.00051
  • Journal of the British Astronomical Association, दूरबीन के सीमांत कांतिमान पर पत्र (1999) — इससे लिया गया: अच्छी परिस्थितियों में नज़र को ज़रा एक ओर रखकर देखने वाले अनुभवी प्रेक्षक के लिए मोटा नियम 3.7 + 5 log D (D मिलीमीटर में); 500 मिलीमीटर के लिए इससे कांतिमान 17.2 निकलता है। https://britastro.org/journal_old/archive/ap99ltrs.htm

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