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SR-1 फ़्रीडम: परमाणु रिएक्टर से चलने वाला नासा का यान मंगल ग्रह तक तीन हेलीकॉप्टर ले जाएगा

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डिजिटल चित्रण: मंगल ग्रह के पास SR-1 फ़्रीडम अंतरिक्ष यान। जालीदार ढाँचे वाले एक लंबे बूम के एक सिरे पर बेलन के आकार का रिएक्टर मॉड्यूल है और दूसरे सिरे पर दो ऊँचे सुनहरे सौर पैनल; पीछे नारंगी रंग का ग्रह।
यह कलाकार की कल्पना है, तस्वीर नहीं: मंगल ग्रह के पास SR-1 फ़्रीडम। परमाणु ऊर्जा मॉड्यूल लंबे बूम के दूर वाले सिरे पर है; दोनों सुनहरे पैनल यान के मुख्य ढाँचे पर लगे सौर पैनल हैं। यह यान अभी उड़ा नहीं है, और तय प्रमोचन से पहले इसका डिज़ाइन बदल भी सकता है।NASA/Alberto Bertolin (आकार बदला गया) · NASA Images and Media Usage Guidelines

नासा SR-1 फ़्रीडम नाम का अंतरिक्ष यान बना रहा है, जो पृथ्वी की कक्षा से बाहर परमाणु विखंडन रिएक्टर चलाने वाला पहला यान होगा। इसका प्रमोचन 2028 के आख़िर में प्रस्तावित है, और यह अपने साथ स्काईफ़ॉल ले जाएगा: मंगल ग्रह के लिए तीन हेलीकॉप्टर, जिन्हें इन्जेनुइटी के आधार पर विकसित किया गया है।

नासा ने 20 अक्टूबर को क्या बताया

20 अक्टूबर 2026 को नासा ने बताया कि स्पेस रिएक्टर-1 (SR-1) फ़्रीडम के परमाणु ऊर्जा मॉड्यूल पर काम आगे बढ़ा है। इस मॉड्यूल के दो हिस्से हैं: एक रिएक्टर, जो परमाणु विखंडन से ऊष्मा पैदा करता है, और एक ऊर्जा-रूपांतरण प्रणाली, जो इस ऊष्मा को बिजली में बदलती है। यही बिजली यान के उपकरणों और उसके विद्युत प्रणोदित्रों (इलेक्ट्रिक थ्रस्टरों) को चलाएगी।

रिएक्टर का डिज़ाइन अमेरिकी ऊर्जा विभाग की इडाहो नेशनल लैबोरेटरी तैयार कर रही है। रूपांतरण प्रणाली “बंद ब्रेटन चक्र” पर काम करती है: एक गैस बंद घेरे में घूमती रहती है, रिएक्टर उसे गरम करता है और गरम गैस एक टरबाइन को घुमाती है। यह प्रणाली सिएरा लोबो इंक. नाम की कंपनी एक ऐसे अनुबंध के तहत देगी, जिसकी देखरेख क्लीवलैंड स्थित नासा का ग्लेन रिसर्च सेंटर करता है। नासा के अनुसार इन अनुबंधों से तकनीकी जोखिम घटता है और मिशन को तय समय-सारणी पर चलाने में मदद मिलती है।

इस उड़ान से जुड़ी हर बात अभी योजना ही है: नासा का लक्ष्य 2028 के आख़िर में प्रमोचन और 2029 में मंगल ग्रह तक पहुँचना है। नासा यह भी कहता है कि जब तक यान पृथ्वी की कक्षा से निकल नहीं जाता, तब तक रिएक्टर बंद रहेगा; यानी न तो वह प्रमोचन के समय चलेगा और न तब, जब यान पृथ्वी के चक्कर लगा रहा होगा। नासा के तथ्य-पत्रक के अनुसार कक्षा छोड़ने के 48 घंटे के भीतर रिएक्टर चालू कर दिया जाएगा।

परमाणु ऊर्जा से विद्युत नोदन क्यों?

रासायनिक रॉकेट थोड़ी देर के लिए ज़ोरदार धक्का देता है और फिर बिना इंजन चलाए अपनी रफ़्तार से आगे बढ़ता रहता है। विद्युत प्रणोदित्र अलग ढंग से काम करता है: वह ज़ेनॉन जैसी किसी गैस को आयनित करता है और विद्युत तथा चुंबकीय क्षेत्रों की मदद से आयनों को बाहर धकेलता है। इसका धक्का बहुत हल्का होता है, पर वह महीनों तक चलता रह सकता है, और इसमें नोदक, यानी बाहर फेंका जाने वाला पदार्थ, बहुत कम ख़र्च होता है। नासा के अनुसार रासायनिक प्रणालियों की तुलना में विद्युत नोदन में ज़रूरी नोदक की मात्रा 90% तक कम हो सकती है।

विद्युत प्रणोदित्र की ताक़त इस पर टिकी होती है कि उसे कितनी बिजली मिलती है, और यह बिजली सौर पैनलों से भी आ सकती है और परमाणु रिएक्टर से भी। नासा बताता है कि मंगल ग्रह पर धूल भरी आँधियाँ हफ़्तों तक सतह पर धूप पहुँचने नहीं देतीं, और चंद्रमा पर ध्रुवों के पास की सबसे अच्छी जगहों पर भी कई-कई दिन अंधेरा रहता है; इसलिए रिएक्टर ऐसी बिजली देता है जो सूर्य पर निर्भर नहीं होती। SR-1 फ़्रीडम का काम पहले अंतरिक्ष में इस तकनीक को परखना है; उसके बाद एक अलग रिएक्टर, लूनर रिएक्टर-1, चंद्रमा पर भेजा जाना है, जिसका लक्ष्य 2030 है।

नासा के अनुसार रिएक्टर से 20 किलोवाट से ज़्यादा बिजली मिलेगी। यान को 12 किलोवाट का हॉल प्रणोदित्र (हॉल थ्रस्टर) आगे बढ़ाएगा, जो विद्युत प्रणोदित्र का ही एक प्रकार है। रिएक्टर का ईंधन HALEU यूरेनियम होगा, यानी ऐसा यूरेनियम जिसे आम परमाणु बिजलीघरों के ईंधन से ज़्यादा संवर्धित किया जाता है, पर फिर भी वह ‘कम संवर्धित यूरेनियम’ की श्रेणी में ही गिना जाता है। यान का द्रव्यमान लगभग 12,000 किलोग्राम है। यह पहले से मौजूद एक यान-ढाँचे पर बना है, जिसका नाम Power and Propulsion Element (बिजली और नोदन मॉड्यूल) है; इसके अपने सौर पैनल 48 किलोवाट बिजली देते हैं, और जिस नए हिस्से को परखा जाना है, वह रिएक्टर है। तुलना के लिए: परसेवेरेंस रोवर का रेडियोआइसोटोप जनरेटर प्रमोचन के समय लगभग 110 वाट बिजली देता था, यानी योजना के अनुसार SR-1 का रिएक्टर इसकी लगभग 180 गुना बिजली देगा।

  • रिएक्टर बनाम रेडियोआइसोटोप जनरेटर: परसेवेरेंस के जनरेटर को प्लूटोनियम-238 के प्राकृतिक रेडियोधर्मी क्षय से ऊष्मा मिलती है। परमाणु रिएक्टर इसके बजाय यूरेनियम के परमाणुओं को तोड़कर ऊष्मा पैदा करता है और कहीं ज़्यादा बिजली दे सकता है: SR-1 के रिएक्टर से 110 वाट के बजाय 20 किलोवाट से ज़्यादा बिजली मिलने की योजना है।
  • पहले का अनुभव: नासा के अनुसार अमेरिका अब तक सिर्फ़ एक रिएक्टर अंतरिक्ष में भेज चुका है, 1965 में SNAP-10A, और वह भी कभी पृथ्वी की कक्षा से बाहर नहीं गया।

स्काईफ़ॉल: मंगल ग्रह के लिए तीन हेलीकॉप्टर

SR-1 फ़्रीडम का नीतभार (पेलोड) स्काईफ़ॉल है: तीन हेलीकॉप्टर, जिन्हें इन्जेनुइटी के आधार पर विकसित किया गया है। इन्जेनुइटी ने किसी दूसरे ग्रह पर पहली बार मोटर से संचालित, नियंत्रित उड़ान भरी थी। SR-1 फ़्रीडम मंगल ग्रह के पास से गुज़रते हुए इन हेलीकॉप्टरों को अपने से अलग कर देगा; वे कहाँ उतरेंगे, यह नासा ने अभी तय नहीं किया है।

वहाँ उड़ना आसान नहीं है। मंगल ग्रह पर गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी का लगभग एक-तिहाई है, जिससे उड़ने में मदद मिलती है, लेकिन सतह पर हवा का दाब पृथ्वी के मुक़ाबले सिर्फ़ लगभग 1% है, इसलिए रोटर के ब्लेड जिस हवा को नीचे धकेलते हैं, उसमें अणु बहुत कम होते हैं। तीनों हेलीकॉप्टर ज़मीन के भीतर तक देखने वाला रडार (ग्राउंड-पेनिट्रेटिंग रडार) और कैमरे ले जाएँगे, ताकि सतह के नीचे छिपी बर्फ़ खोजी जा सके; वे हवा का तापमान और हवा की रफ़्तार और दिशा भी मापेंगे। नासा को उम्मीद है कि इससे भविष्य में इंसानों के उतरने की जगहें चुनने में मदद मिल सकती है, और उसके अनुसार ये हेलीकॉप्टर कई महीनों तक, शायद कई सालों तक, काम कर सकते हैं।

शौक़िया खगोलविद क्या देख सकते हैं?

फ़िलहाल कुछ नहीं: यान का अभी प्रमोचन नहीं हुआ है, और उसका रिएक्टर पृथ्वी की कक्षा से निकलने के बाद ही चालू किया जाएगा। यह अंतरिक्ष-तकनीक की ख़बर है, आकाश में होने वाली कोई घटना नहीं, इसलिए रात के आकाश में इसे खोजने का कोई मतलब नहीं है।

जिस पर नज़र रखी जा सकती है, वह है इसकी समय-सारणी। 2028 में मंगल ग्रह के लिए खुलने वाली प्रमोचन विंडो को आगे-पीछे नहीं किया जा सकता, क्योंकि उसके लिए पृथ्वी और मंगल का एक-दूसरे के सापेक्ष सही स्थिति में होना ज़रूरी है; अगर यान उस विंडो में रवाना न हो सका, तो अगली विंडो लगभग 26 महीने बाद खुलेगी। ताज़ा स्थिति नासा के SR-1 फ़्रीडम मिशन पेज और नासा की प्रेस विज्ञप्तियों में मिलेगी।

स्रोत और लाइसेंस

  • नासा, परमाणु ऊर्जा मॉड्यूल पर प्रगति के साथ SR-1 फ़्रीडम आगे बढ़ा (SR-1 Freedom Advances with Progress on Nuclear Power Module, 20 अक्टूबर 2026) — रिएक्टर और ऊर्जा-रूपांतरण मॉड्यूल, इडाहो नेशनल लैबोरेटरी और सिएरा लोबो की भूमिका, बंद ब्रेटन चक्र, सुरक्षा से जुड़ा बयान, 2028 के आख़िर में प्रमोचन और स्काईफ़ॉल। https://www.nasa.gov/centers-and-facilities/glenn/sr-1-freedom-advances-with-progress-on-nuclear-power-module/
  • नासा, स्पेस रिएक्टर-1 फ़्रीडम (SR-1 फ़्रीडम) का मिशन पेज (Space Reactor-1 Freedom) — प्रमोचन और पहुँचने के साल, द्रव्यमान, ईंधन, 20 किलोवाट बिजली, 12 किलोवाट का हॉल प्रणोदित्र, स्काईफ़ॉल के उपकरण, और मंगल ग्रह का गुरुत्वाकर्षण और हवा का दाब। https://www.nasa.gov/mission/space-reactor-1-freedom/
  • नासा, परमाणु ऊर्जा के सहारे अंतरिक्ष में अमेरिका (America Underway in Space on Nuclear Power, तथ्य-पत्रक) — 20 किलोवाट का आँकड़ा, मंगल ग्रह की धूल भरी आँधियाँ, 1965 का SNAP-10A, और पृथ्वी की कक्षा छोड़ने के 48 घंटे के भीतर रिएक्टर का चालू होना। https://www.nasa.gov/wp-content/uploads/2026/03/america-underway-in-space-on-nuclear-power.pdf
  • नासा, विद्युत नोदन पर लेख (The Propulsion We're Supplying, It's Electrifying, 2020) — विद्युत नोदन कैसे काम करता है, और रासायनिक नोदन की तुलना में 90% तक नोदक की बचत। https://www.nasa.gov/humans-in-space/the-propulsion-were-supplying-its-electrifying/
  • नासा/JPL, मार्स 2020 परसेवेरेंस रोवर के पुर्ज़े (Mars 2020 Perseverance rover components) — रेडियोआइसोटोप जनरेटर, प्लूटोनियम-238 और प्रमोचन के समय लगभग 110 वाट। https://science.nasa.gov/mission/mars-2020-perseverance/rover-components/

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